मक्का, टूटे चावल और गन्ने से बने एथनॉल को एलपीजी के विकल्प के रूप में बढ़ावा, बिहार बन सकता है अग्रणी राज्य

Rohit Mehta
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Rohit Mehta एक भारतीय ब्लॉगर, जर्नलिस्ट, ऑथर और एंटरप्रेन्योर हैं, जो डिजिटल मीडिया और ऑनलाइन कंटेंट इंडस्ट्री में अपनी पहचान बना चुके हैं। वे Digital Gabbar...
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Ethanol Bihar
Ethanol Bihar (PC: Social Media Sites)

पटना/नई दिल्ली। देश में रसोई गैस (एलपीजी) की आपूर्ति और कीमतों को लेकर बढ़ती चुनौतियों के बीच एथनॉल को कुकिंग फ्यूल के विकल्प के रूप में तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। मक्का, टूटे चावल और गन्ने के रस से तैयार एथनॉल को स्वच्छ, सस्ता और घरेलू रूप से उपलब्ध ईंधन के रूप में देखा जा रहा है।

ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि एथनॉल-आधारित कुकटॉप एलपीजी पर निर्भरता कम कर सकते हैं। यह पहल ऐसे समय में महत्वपूर्ण मानी जा रही है जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति बाधित हो रही है और कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है।

बिहार इस दिशा में बड़ी भूमिका निभा सकता है। राज्य में प्रतिवर्ष करीब 90 करोड़ लीटर एथनॉल उत्पादन की क्षमता आंकी गई है। राज्य सरकार पहले ही एथनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए नीतिगत कदम उठा चुकी है, जिससे किसानों को मक्का और गन्ने की बेहतर कीमत मिलने की संभावना है।

उद्योग संगठनों का कहना है कि एथनॉल न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि इसके इस्तेमाल से कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आती है। साथ ही, यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में सहायक हो सकता है, क्योंकि इसका कच्चा माल स्थानीय स्तर पर उपलब्ध है।

हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि एथनॉल को बड़े पैमाने पर कुकिंग फ्यूल के रूप में अपनाने से पहले इसकी सप्लाई चेन, स्टोरेज और सुरक्षा मानकों पर और काम करने की जरूरत है। सरकार द्वारा यदि इसे मंजूरी मिलती है, तो आने वाले समय में भारतीय रसोई में एलपीजी के साथ-साथ एथनॉल भी एक प्रमुख विकल्प बन सकता है।

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