ईरान युद्ध की आग और भारतीय परिवारों की जेब: क्या है जमीनी सच?

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CA Kunal Kishore
महासचिव, बिहार एथेनॉल एसोसिएशनसंस्थापक-निदेशक, Invest Aid India सह-संस्थापक, Karekeba Ventures (एथेनॉल नीति, बायोफ्यूल अर्थशास्त्र एवं ऊर्जा व्यापार के विशेषज्ञ)
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The Flames Of War In Iran And The Situation Of Indian Families (2)
The Flames Of War In Iran And The Situation Of Indian Families (2) (PC: Social Media Sites)

भारत इस युद्ध का हिस्सा नहीं है। न ही हमारा कोई सैनिक ईरानी धरती पर है और न ही हमने कोई मिसाइल दागी है। इसके बावजूद, आपके किचन का गैस सिलेंडर, दुबई से आपके भाई द्वारा भेजा जाने वाला पैसा और हर हफ्ते कमजोर होता रुपया—सबके तार इसी संघर्ष से जुड़े हैं। यह लेख विश्लेषण करता है कि कैसे एक सुदूर युद्ध भारत के आम आदमी की थाली और बैंक बैलेंस को प्रभावित कर रहा है।

हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य: वैश्विक अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा पर संकट

फारस की खाड़ी से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता ‘हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) है। मात्र 33 किलोमीटर चौड़ा यह मार्ग दुनिया के 20% कच्चे तेल और भारी मात्रा में एलएनजी (LNG) की आवाजाही का केंद्र है। युद्ध के कारण इस मार्ग के प्रभावी रूप से बंद होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार में कोहराम मच गया है।

भारत के लिए यह एक सीधा ‘बॉडी ब्लो’ है। हम अपनी तेल जरूरतों का 85% आयात करते हैं। फरवरी 2026 में $72 प्रति बैरल पर रहने वाला ब्रेंट क्रूड अब $117 के पार जा चुका है—यानी कुछ ही हफ्तों में 60% की भारी वृद्धि।

सीधे शब्दों में कहें तो: महंगा तेल मतलब महंगा डीजल, जिससे माल ढुलाई महंगी होती है और अंततः मंडियों में सब्जियों के दाम बढ़ जाते हैं। उर्वरक (Fertilizer) की लागत बढ़ती है, बिजली महंगी होती है और युद्ध का बिल आपके खाने की मेज तक पहुंच जाता है।

रुपया ₹94.79 के पार: आपकी बचत पर सीधी मार

ऊर्जा संकट और प्रेषण (Remittances) की अनिश्चितता के कारण भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले ₹94.79 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर आ गया है। इसके पीछे का अर्थशास्त्र सरल है: भारत तेल डॉलर में खरीदता है। जब रुपया गिरता है, तो वही एक बैरल तेल हमें अधिक रुपयों में पड़ता है।

कच्चे तेल की कीमतों में हर $10 प्रति बैरल की वृद्धि भारत के चालू खाता घाटे (CAD) को जीडीपी के 0.4–0.5% तक बढ़ा देती है। इस अंतर को पाटने के लिए सरकार को या तो विदेशी मुद्रा भंडार खर्च करना पड़ता है या कर्ज लेना पड़ता है। ये दोनों ही रास्ते अंततः महंगाई या सरकारी सेवाओं में कटौती के रूप में आम नागरिक की जेब पर बोझ डालते हैं।

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91 लाख भारतीय और बिहार का आर्थिक सरोकार

यह युद्ध बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के लिए केवल अंतरराष्ट्रीय समाचार नहीं, बल्कि एक व्यक्तिगत संकट है। खाड़ी देशों (GCC) में 91 लाख से अधिक भारतीय कार्यरत हैं। ये प्रवासी हर साल लगभग $51 बिलियन घर भेजते हैं, जो भारत के कुल प्रेषण प्रवाह का 38% है। यह राशि अमेरिका के साथ भारत के कुल व्यापार अधिशेष (Trade Surplus) के बराबर है।

खाड़ी में काम करने वाले हमारे भाई तेल सेवाओं, निर्माण और खुदरा क्षेत्रों में हैं—जो युद्ध से सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। लंबे समय तक चलने वाला युद्ध यानी नौकरियों का जाना और उस पैसे का रुकना, जो पटना, मुजफ्फरपुर और दरभंगा के गांवों की अर्थव्यवस्था चलाता है। मार्च 2026 के आंकड़े बताते हैं कि टियर-2 और टियर-3 शहरों के रियल एस्टेट में 14% की वृद्धि देखी गई है, लेकिन यह खुशी की बात नहीं है; यह उन परिवारों की वापसी है जिनका विदेश में रोजगार छिन गया है।

किसान और उर्वरक: दोहरी मार

भारत अपने यूरिया और फॉस्फेट का 40% से अधिक हिस्सा खाड़ी देशों से मंगवाता है। कतर से एलएनजी उत्पादन घटने के कारण भारत में तीन यूरिया संयंत्रों ने उत्पादन कम कर दिया है। खरीफ की बुवाई का सीजन करीब है। ऐसे में खाद की कमी या उसकी बढ़ती कीमतें बिहार के किसान के लिए एक बड़ा संकट बन सकती हैं।

भारत के पास विकल्प क्या हैं?

यद्यपि रूस और अमेरिका वैकल्पिक स्रोत हैं, लेकिन बुनियादी ढांचा रातों-रात नहीं बदला जा सकता। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये को संभालने के लिए $12–15 बिलियन खर्च किए हैं। हमारा $723 बिलियन का विदेशी मुद्रा भंडार एक मजबूत सुरक्षा कवच है, लेकिन यह अजेय नहीं है।

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कड़वा सच यह है कि भारत ने दशकों से खाड़ी के साथ जो गहरा आर्थिक एकीकरण (Energy, Labor, Trade) किया है, उसने हमें समृद्धि तो दी, लेकिन इस युद्ध ने हमारी उस निर्भरता की भारी कीमत भी उजागर कर दी है।

यह युद्ध हमारा नहीं है, लेकिन इसकी आर्थिक किस्तें हर भारतीय परिवार को चुकानी पड़ रही हैं—रसोई गैस, अनाज की कीमतों और उन उम्मीदों के रूप में जो अब सरहद पार से समय पर घर नहीं पहुंच पा रही हैं।

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